वायु प्रदूषित होने के कारण बच्चों में तेजी से बढ़ रहा है अस्थमा रोग, जानिए बचाव के तरीक़े

Smina Sumra
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आज हम आपको बताने जा रहे हैं बच्चों में वायु प्रदूषण के कारण किस तरह अस्थमा की समस्या उत्पन्न हो रही है। अस्थमा के साथ-साथ और भी कई गंभीर बीमारियां वायु प्रदूषण के कारण बच्चों में हो जाती है। आइए जानते हैं इस बारे में विस्तार से।

Air pollution: तापमान के नीचे गिरने के साथ-साथ देश के कई बड़े बड़े राज्यों में एयर क्वालिटी का स्तर गिरता जा रहा है। इसका कारण है कि यह वायु प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों से अवगत करा रहा है। आज इस लेख में हम आपको वायु प्रदूषण से होने वाले समस्याओं को बताएंगे। ख़ासकर बच्चों के अंदर अस्थमा के साथ-साथ अन्य रोगों की परेशानियां लगातार बढ़ती जा रही है। इस विषय पर डॉक्टर्स का क्या कहना है आइए वो भी जानते हैं।

वायु का प्रदूषित होना बच्चों के स्वास्थ्य के लिए ख़तरनाक (Air pollution is dangerous for children’s health)

डॉक्टर्स बताते हैं कि वायु प्रदूषण बच्चों के लिए भी उतना ही नुक़सान होता है जितना कि बड़ों के लिए होता है। कई स्थितियों में यह बड़ों की तुलना में बच्चों के लिए ज़्यादा ही परेशानियां खड़ी कर देते हैं। इसके कारण छोटे बच्चों में निमोनिया, अस्थमा और सांस लेने की परेशानी जैसी समस्या पैदा हो रही है। इसके साथ-साथ उनके फेफड़े और श्वास नली को भी नुक़सान पहुंच रहा है। इसके कारण बच्चों में आंखों की परेशानी, खुजली, जलन और स्किन इन्फेक्शन आदि की समस्याएं भी बढ़ती जा रही है।

वायु प्रदूषण से बच्चों पर अस्थमा का प्रभाव (Effects of asthma on children due to air pollution)

हवा के प्रदूषित होने के कारण बच्चों में अस्थमा की समस्या तेज़ी से बढ़ती जा रही है। जब हवाओं के छोटे-छोटे कण बच्चों के नाक या मुंह के द्वारा गुज़रते हैं तो वह उनके फेफड़ों को नुक़सान पहुंचाते हैं। जो गाड़ियों के धुंए में या धूल में कण पाए जाते हैं ये सब काफ़ी ख़तरनाक होते हैं। और यह फेफड़ों पर ज़्यादा असर डालते हैं। जिनके कारण बच्चों को अस्थमा जैसी बीमारियों का सामना करना पड़ता है। यह सब धूल और धुएं फेफड़ों में जमा होकर उनके कार्यों में बाधा डालते हैं।

ग्राउंड लेवल ओजोन बच्चों के फेफड़े को अधिक नुक़सान पहुंचा सकते हैं। जब सूरज की किरणें धरती की तरफ आती है तो उन की किरणों के साथ-साथ गाड़ियों, बसों और कारखानों के धुओं का मिश्रण होता है। जो ओजोन को प्रदूषित करता है। इसके कारण आसमान पूरा धुंधला दिखाई पड़ता है। जिसके वजह से कई मिलियन बच्चों को सांस लेने में और अन्य तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

बच्चों में सांस लेने की परेशानी को कैसे बढ़ाते हैं वायु प्रदूषण (How air pollution increases breathing problems in children)

घर के बाहर का Pollution बच्चों के लिए बहुत ही ख़तरनाक होता है। ऐसी कई तरह के ज़हरीले गैसे होते है जो वायु को बुरी तरह से प्रदूषित करते हैं। इन गैसो में कार्बन मोनो ऑक्साइड, सल्फर नाइट्रेट, नाइट्रोजन ऑक्साइड और कार्बन डाइऑक्साइड शामिल होते हैं। जो बच्चों के लिए बहुत ख़तरनाक साबित होते हैं। अगर यह बच्चों की श्वास नली तक पहुंच जाए तो कई बीमारियों को जन्म देते हैं। जैसे सांस लेने में दिक्कत, जुकाम, सीने में जकड़न और एलर्जी जैसे लक्षण बढ़ने लगते हैं।

अस्थमा रोग से बचाव का तरीक़ा (way to prevent asthma)

डॉक्टर्स का कहना है कि जो बच्चे अस्थमा जैसी बीमारियों से ग्रस्त रहते हैं उन्हें इनहेलर हमेशा अपने साथ रखना चाहिए। क्योंकि इनहेलर सांस लेने में हेल्प करता है। साथ ही बच्चों के मास्क पर भी ध्यान देना चाहिए। जब भी बाहर वह निकले तब उनके मुंह और नाक मास्क से कवर होने चाहिए। इसके लिए माता-पिता को चाहिए कि बच्चों को मास्क लगाने के लिए प्रोत्साहित करें। इसके अलावा और भी कुछ बातें हैं जो माता पिता को ख़्याल रखना चाहिए बच्चों के लिए जैसे:-

:- अस्थमा की दवाई नियमित रूप से समय पर दें।

  • :- बच्चों को घर पर ही एक्सरसाइज़ कराने की कोशिश करें।

:- समय-समय पर डॉक्टर से जांच और सलाह लेते रहें।

:- ख़ासकर बच्चों को बिना किसी ज़रूरी काम के घर से बाहर नहीं जाने दें। उन्हें दोपहर या शाम में घर से बाहर ना जाने दें, क्योंकि उस समय ज़्यादा ही वायु प्रदूषित रहते हैं।

:- इस रोग से ग्रसित बच्चों को हर धुएं से बचा कर रखना चाहिए।

बाहर के साथ-साथ घर के अंदर भी बच्चों का ख़ास ख्याल रखें। ख़ासकर जब प्रदूषित हवा आने की संभावना है उस टाइम घर की खिड़कियों को बंद करके रखें। ताकि प्रदूषित हवा घर के अंदर प्रवेश न कर सके। और सबसे ज़रूरी काम घर में ऐसे पौधे लगाएं जो हवा को स्वच्छ कर सके। हो सके तो बच्चे की कमरे में भी एयर प्यूरीफायर लगवाएं ताकि बच्चों को स्वच्छ हवा मिलती रहे।

इन सब बातों का ध्यान में रखकर बच्चों के अंदर अस्थमा जैसी बीमारियों से बचाव किया जा सकता है। ज़्यादा तक़लीफ़ होने पर डॉक्टर से संपर्क ज़रूर करें।

 

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